Sunday, May 17, 2020

आंखों की काली छाई से.....।

कविता:- आंखों की काली छाई से 

आंखों की काली छाई से 

पेड़ की मिली परछाई से 

मैं अपना जीवन काट लेता 

कभी होता दुख मेरे सर कोई 

तो पेड़ों से ही अपना दुख बांट लेता 

लगती भूख मुझे कभी तो पेड़ों से ही कुछ फल मांग लेता 

उसका कर्ज चुकाने के लिए उससे कुछ मोहलत मांग लेता 

मुझे जरूरत नहीं थी किसी के छत पर खटने की 

पर मैंने तेरी जरूरत को समझा 

मेरे होते हुए तुम्हें जरूरत नहीं हुई ना 

बेटे ! भटकने की जो मैंने तेरे प्रति 

अपनी मुहब्बत को समझा 

मेरी जिंदगी उस दौर में थी जिस दौर में जो गुजरा जवाना 

मेरा लक्ष्य बस एक तू ही था और तुम्हारी जिंदगी बनाना 

न चाहता था रुके तेरा कदम तू आगे ही बढ़ते रहना 

प्रेरणा देगी मेरी आंखें तुम्हें 

मेरी आंखों की परछाई को पढ़ते रहना ।



About its creation:- 

आप क्या लिखना चाहते हैं वह तो आप लिख लेंगे पर जिस दिन आपकी भावनाओं में वो बात नहीं रह जाएगी जिसे लिखा जा सकता है तब आप क्या करेंगे? कुछ लोग एक उम्र तक जाते-जाते यह स्वीकार कर लेते हैं कि अब उनकी उम्र नहीं रही लिखने की वह ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वह अपने लेखन को उम्र के साथ जोड़कर देखते हैं पर लेखन एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें उम्र का कोई वास्ता नहीं होता है । उम्र कोई भी हो लेखन सोचने की क्षमता पर निर्भर करती है आपके इस क्षेत्र में रुचि पर निर्भर करती है रही बात आपकी भावनाओं के खत्म होने के बाद की बात तब आप उसके बाद भी अपना लेखन जारी रख सकते हैं जिसमें लेखन तो आपका होगा पर आपको दूसरे के भावों को अपनी कविता में उतारना पड़ेगा कुछ दिनों से मैं अपनी रचनाओं को लेकर बहुत निराश था सप्ताह का सप्ताह बीतता जा रहा था और मेरा मन भावों से खाली था मैं सोच रहा था कि मेरे पास कोई शब्द कोई भाव क्यों नहीं है जिसे मैं अपनी रचना में ढाल सकूं मैंने महसूस किया कि मेरे पास कोई ऐसी बात ही नहीं है जिसे मैं कह सकूं आज तक मैंने अपने संघर्षों के बारे में कविता लिखा था पर कोई और मुझे क्या कहना चाहता होगा उसके संघर्षों की कहानी किस कविता को जन्म देती होगी ऐसा कभी मैंने सोचा ही नहीं था । ये मेरी एक ऐसी कविता है जिसमें एक संघर्ष पूर्ण पिता अपने बेटों को अपने चेहरे के भावों से कुछ कहने की कोशिश कर रहा है ।

 वो पिता मैं नहीं हूँ , मैं कवि हूँ ! 

Thought:- 

लेखन एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें आप उम्र को दोष नहीं दे सकते हैं लेखन में प्रगति आपकी खुशी, उमंग और कल्पना पर निर्भर करता है ।

No comments:

Post a Comment

बिहार के गौरव लौटईय्य कइसे ?

 कविता:- बिहार के गौरव लौटईय्य कइसे ?  बिहार के गौरव लौटईय्य कईसे?  मगध के रजधानी बनईय्य कईसे? कईसे दिलय्य हम मगही के सम्मान  जे हलय 'बो...