Friday, May 31, 2024

नज़्म:- मेरी अभिलाषा

ये जो डर सा लगा रहता है 

खुद को खो देने का,

ये जो मैं हूं 

वो कौन है ?

जो मैं हूं ! 

मैं एक शायर हूं ।

एक लेखक हूं ।

एक गायक हूं मगर 

मैं रह सकता हूं सदा 

जो मैं हूं 

कौन कहता है मुझे ?

कि लिखने के लिए 

मखमल की मेज़ चाहिए, 

फूलों की सेज चाहिए और 

खाने को नानवेज चाहिए, 

नहीं ! मैं हर स्थिति में 

वही हूं जो मैं हूं 

मैं एक शायर ! हूं 

लेखक ! हूं, गायक ! हूं।

ये सांसारिक भोग की वस्तुएं

जरूरत तो हैं मेरी मगर

अभिलाषा नहीं मेरी

मेरी अभिलाषा है कि

मैं जीवन भर शायर रहूं

लेखक रहूं, गायक रहूं ।  

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