Sunday, May 17, 2020

मेरा कवि और उसका कवित्व ।

कविता:-मेरा कवि और उसका कवित्व 


जिंदगी के इस दौड़ में मेरा कवित्व कहीं खो गया है 

मैं भी पूछूं मेरा कवि जाने क्यों यूँ सो गया है 

कविता लिखने की कोई उम्र नहीं उमंग होती है 

कैसे लिखे मेरा कवि उसकी जिंदगी में आजकल हुड़दंग होती है 


लिखता था मेरा कवि उन दिनों की बात है 

आनंदित होता था कहता था कि मेरी कविताएं हमारे साथ हैं  

लिखता था मेरा कवि उसका कोई उद्देश्य होता था 

लिखता था मेरा कवि पत्र-पत्रिकाओं का निर्देश होता था 

पैसों का भूखा नहीं मेरा कवि प्यार का भूखा था 

क्या कहूं लिखना छोड़ दिया मेरे कवि ने 

इस दौर में अखबार इश्तिहार का भूखा था 




जब लिखता था मेरा कवि उमंगों में जोश होता था 

क्या वह दिन थे जब लिखता था 

तो न खाने-पीने और न सोने का होश होता था।


About its creation:- 

मुझसे कोई पूछे कि इंसान का सबसे कठिन दिन कौन सा होता है तो मैं उन्हें अपने पूरे अनुभवों से खंगाल कर एक ही उत्तर दूंगा कि जब इंसान के जीवन में अचानक परिवर्तन हो जाता है तब का दिन इंसान के लिए संघर्षों से भरा होता है आप कहेंगे अचानक परिवर्तन हाँ  अचानक परिवर्तन अगर आप खाना खा रहे हो और कोई खाने के निवाले को आपके मुंह तक जाने से पहले आपके हाथों को पकड़ ले और कहे कि अभी काम बाकी है चलो बहुत खा लिया तो लगता है कि संघर्ष शुरू हो गया अब तो बिना कमाए खाना भी नहीं मिलेगा और मेरे लिए कविता लिखने के अलावा किसी भी काम को करना मानो अपने आपको खोना था मैं बहुत नाराज होता हूँ । जब मुझे लगता है कि किसी और काम को करके मुझे सफलता मिल रही है क्योंकि मेरा उद्देश्य ही बन गया है कि मैं कविता लिखूँ इसके अलावा मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है पर लिखूँ  भी तो लिखूँ किसके लिए यही सवाल जेहन में है कोई सुनता है ना कोई पढता है बस हम लिखते हैं आजकल अखबारों में भी साहित्य का स्थान कितना बड़ा है आप इसी से समझ सकते हैं कि मेरे घर में अमर उजाला नाम की एक पत्रिका आती है जिसमें एक बित्ते से भी कम कवियों के बारे में या साहित्यकारों के बारे में जानने को मिलता है उनकी रचनाएं तो दूर की बात है बस उनका भी और साहित्यकारों के बारे में जानकर क्या करेंगे जब तक कि आप उनकी रचनाओं को नहीं जान लेते जहां तक साहित्य की बात रही वह तो अखबारों में कहीं नहीं दिखती हैं, हाँ बस अखबारों में इश्तिहार ही बिकती है ।





Thought:- 

अखबार पर छपे इश्तिहार हमारे देश के औद्योगिक क्षेत्रों को समृद्ध तो कर सकती है पर देश के लोगों को मानसिक रूप से समृद्ध करना साहित्य का काम है ।




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